Most Important Articles of Indian Constitution(संविधान) in Hindi – Polity – Part-5


राज्य के निति निर्देशक तत्व 

भारतीय संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 तक (16 अनुच्छेदो) में राज्य के निति निर्देशक तत्व शीर्षक से न्यायिक रूप से अप्रवर्तनीय किन्तु शासन की निति में मूलभूत तत्व के रूप में स्वीकृत उन उपबंधों का वर्णन किया गया है जो सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय को बढ़ावा देकर लोक कल्याणकारी राज्य की स्थापना करेंगे 

मूल संविधान में वर्णित 16 अनुच्छेदों के साथ कुछ नये उपबन्ध भी अन्त स्थापित किए गए है जैसे -42 वे संशोधन 1976 द्वारा अनुच्छेद 39(क), अनुच्छेद 43(क) अनुच्छेद 48(क) 44 वे संशोधन 1978 के द्वारा 38(ख) तथा 86 वे संविधान संशोधन 2002 के द्वारा 45(क) 

ऐसे निति निर्देशक तत्व जो न्याय निर्णय नहीं है -अनुच्छेद 39,  अनुच्छेद 42,  अनुच्छेद 43, अनुच्छेद 45

निति निर्देशक तत्वों का प्रमुख स्रोत्र आयरलैंड का संविधान है किन्तु इसके प्रभाव की व्यापकता को दो दिशाओ का स्पर्श करती है प्रथम संवैधानिक तथा द्वितीय विचारात्मक 

भारतीय संविधान के निति निर्देशक तत्वों को तेज बहादुर सप्र समिति द्वारा तैयार किए गए थे 

डॉ अम्बेडकर ने निति निर्देशक तत्वों को भारतीय संविधान की अनोखी एवं महत्वपूर्ण विशेषता कहा है 

मौलिक कर्तव्य —

भारतीय संविधान के 42 वे संविधान संशोधन 1976 द्वारा संविधान के भाग 4 में एक नया भाग 4(क ) जोड़कर अनुच्छेद 

51(क ) के तहत मौलिक कर्तव्य की व्यवस्था की गई है 

भारत के संविधान में इनका समावेश सरदार स्वर्ण सिंह समिति की अनुशंसा के आधार पर पूर्व सोवियत संघ के संविधान से प्रभावित होकर किया गया है 

स्वर्ण सिंह समिति ने 8 मौलिक कर्तव्यों की अनुशंसा की थी किन्तु भारतीय संसद में दो अतिरिक्त मौलिक कर्तव्यों का निर्धारण किया है 

86 वे संविधान संशोधन 2002 के तहत शिक्षा के अधिकार को जोड़ा इस प्रकार वर्तमान में कुल 11 मौलिक कर्तव्य है जिनके अनुसार प्रत्येक भारतीय नागरिक का यह कर्तव्य होगा कि वह 

1- संविधान का पालन करें और उसके आदर्शो संस्थाओ राष्ट्रध्वज और राष्ट्रगान का आदर करें 

2- स्वतंत्रता के लिए हमारे राष्ट्रीय आंदोलन को प्रेरित करने वाले उच्च आदर्शो को हृदय में संजोए रखे और उनका पालन करें 

3-भारत की प्रभुता एकता और अखंडता की रक्षा करें और अक्षुण्ण रखे 

4- देश की रखा करें 

5- भारत के सभी लोगो में समरसता और समान भ्रातृत्व की भावना का निर्माण करें 

6- हमारी सामाजिक संस्कृति की गौरवशाली परम्परा का महत्त्व समझे और उसका परिरक्षण करें 

7-प्राकृतिक पर्यावरण की रक्षा और उसका संवर्धन करें 

8-वैज्ञानिक दृष्टिकोण और ज्ञानजेन की भावना का विकास करें 

9-सार्वजानिक सम्पति को सुरक्षित रखे 

10-व्यक्तिगत और सामूहिक गतिविधियों के सभी क्षेत्रो में उत्कर्ष की ओर बढ़ने का सतत प्रयास करें 

11- 6-14 वर्ष की आयु के बच्चों के माता पिता अभिभावक या संरक्षक को अपने बच्चों को शिक्षा दिलाने का अवसर उपलब्ध कराना चाहिए 

संघीय कार्यपालिका –

राष्ट्रपति –

भारतीय संविधान में उल्लेखित है कि समस्त कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होंगी उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान के किसी अनुच्छेद में कही पर यह नहीं लिखा है कि समस्त विधायी शक्ति संसद में निहित होंगी अथवा समस्त न्यायिक शक्ति उच्चतम न्यायालयों में निहित होंगी 

राष्ट्रीयपति कार्यपालिका का औपचारिक प्रधान तथा मंत्रिपरिषद कार्यपालिका का वास्तविक प्रधान होगा 

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 52 में कहा गया है कि भारत का एक राष्ट्रपति होगा 

संघ की कार्यपालिका शक्ति राष्ट्रपति में निहित होंगी तथा वह इसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं अथवा अधीनस्थ पदाधिकारियों के द्वारा करेगा 

अनुच्छेद 53(2) के अनुसार पूर्वगामी उपबन्धों की व्यापकता पर प्रतिकूल प्रभाव डाले बिना संघ के रक्षा बलो का सर्वोच समादेश राष्ट्रपति में निहित होगा और उसका प्रयोग विधि द्वारा विनियमित होगा

राष्ट्रपति पद की योग्यताए (अनुच्छेद 58)-

वह भारत का नागरिक हो 

वह 35 वर्ष की आयु पूरी कर चूका हो 

वह लोक सभा का सदस्य निर्वाचित होने को योग्यता रखता हो इसके अतिरिक्त ऐसा कोई भी व्यक्ति जो भारत सरकार या स्थानीय सरकार के अंतर्गत पदाधिकारियों हो राष्ट्रपति के पद का उम्मीदवार नहीं हो सकता 

राष्ट्रपति का निर्वाचन –

राष्ट्रपति के चूनाव के लिए अप्रत्यक्ष निर्वाचित की पद्धति को अपनाया गया है राष्ट्रपति के निर्वाचक मण्डल में निम्नलिखित सदस्य होते है 

संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्य 

राज्य विधानसभाओ और 70 वे संवैधानिक संशोधन (1992) के अनुसार संघ शासित क्षेत्रो (दिल्ली व पाण्डिचेरी ) की विधानसभाओ के निर्वाचित सदस्य 

राष्ट्रपति का चूनाव आनुपातिक प्रतिनिधित्व की एकल संक्रमणीय मत पद्धति के अनुसार होता है 

चूनाव में सफल होने के लिए उम्मीदवार को एक न्यूनतम कोटा प्राप्त करना आवश्यक होता है न्यूनतम कोटा निर्धारित करने के लिए सूत्र = दिए गए मतो की संख्या /निर्वाचित होने वाले प्रतिनिधि की संख्या +1

राष्ट्रपति के निर्वाचन की एक विशेष बात यह है कि निर्वाचक मण्डल के प्रत्येक सदस्य के मत का मूल्य समान नहीं होता 

किसी भी राज्य या संघीय क्षेत्र की विधानसभा के सदस्य के सदस्य के मतों की संख्या = राज्य या संघीय क्षेत्र की जनसंख्या /राज्य विधानसभा या संघीय kshetro

की विधानसभा के निर्वाचित सदस्यों की संख्या 

संसद के प्रत्येक सदन के प्रत्येक निर्वाचित सदस्यों के मतों की संख्या समस्त राज्यों और संघीय क्षेत्रो की विधानसभाओ के समस्त =सदस्यों को प्राप्त मतों की संख्याओं का कुल योग / संसद के दोनों सदनों के निर्वाचित सदस्यों की संख्या 

राष्ट्रपति के चूनाव से सम्बंधित 11 वे संशोधन के तहत यह व्यवस्था दीं गई कि निर्वाचक मण्डल में स्थान रिक्त होते हुये भी राष्ट्रपति पद का चूनाव कराया जा सकता है 

राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार प्रत्येक व्यक्ति के नाम कम से कम से कम 50 निर्वाचकों द्वारा प्रस्तावित व कम से कम 50 निर्वाचक द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिये 

इसी प्रकार उपराष्ट्रपति पद के लिए उम्मीदवार का नाम कम से कम 20 निर्वाचकों द्वारा प्रस्तावित और कम से कम 20 निर्वाचकों द्वारा प्रस्तावित और कम से कम 20 निर्वाचकों द्वारा अनुमोदित किया जाना चाहिये 

राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के चूनाव से सम्बंधित सभी शंकाओ और विवादों की जाँच का कार्य उच्चतम न्यायालय द्वारा किया जाएगा 

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *