Most Important Indian Constitution(संविधान) Questions in Hindi – Polity – Part-4


बन्दीकरण एवं निरोध के विरूद्ध सांविधानिक संरक्षण –

  • अनुच्छेद 22, अनुच्छेद 21 का पूरक है और इन दोनों को एक साथ पढना चाहिये 
  • अनुच्छेद 22 उन प्रक्रियात्मक शर्तो को निर्देशित करता है जिसका विधानमंडल द्वारा विहित किसी प्रक्रिया में होना आवश्यक है 

विधानमंडल को विधि निर्मित करने की पूर्ण स्वतंत्रता है तथा वह विधि पारित करके प्रक्रिया विहित कर सकता है यह निर्णय ए के गोपालन बनाम मद्रास राज्य के वाद में किया गया है 

दण्डात्मक गिरफतारी निरुद्ध व्यक्ति को दण्ड देने के उददेश्य से की जाती है जबकि निवारक बन्दीकरण का उददेश्य दण्ड देना नहीं वरन अपराधी को अपराध से रोकना है अत निवारक गिरफ़्तारी दण्डात्मक गिरप्तारी से भिन्न है 

भारतीय संसद द्वारा निवारक निरोध कानून सन 1950 में पारित किया गया था 

निवारक निरोध कानून भारतीय संविधान का भाग है जबकि अमेरिका में यह कानून संविधान का भाग नहीं हैयदि किसी व्यक्ति को पुलिस गिरप्तारी का कारण तुरन्त बता दिया जाता है 

यदि गिरप्तारी का कारण नहीं बताया जाता है तो वह व्यक्ति जमानत मिलने के बाद भी अपनी गिरफ़्तारी का कारण जान सकता है

गिरप्तारी किए  गए व्यक्ति को 24 घण्टे के अन्दर निकटतम मजिस्ट्रेट के समक्ष कोर्ट में हाजिर करना पड़ता है 

7 मई 1971 को आंतरिक सुरक्षा व्यस्था अध्यादेश (MISA ) जारी किया गया इस अध्यादेश ने जून 1971 ई  में कानून का रूप धारण कर लिया इसे 1979 ई में रदद कर दिया गया 

24 सितम्बर 1983 को राष्ट्रीय सुरक्षा अध्यादेश अधिनियम बनाया गया यह अधिनियम विध्वंशक गतिविधियों को निंयत्रित करने के लिए लाया गया जो सन 1985 में लागू किया गया इसे ही टाडा (TaDa ) के नाम से जाना जाता है टाडा कानून 23 मार्च 1995 तक लागू रहा 

सन 2003 में संसद के संयुक्त अधिवेशन में पोटा कानून पारित किया गया लेकिन वर्ष 2004 में इसे समाप्त कर दिया गया 

शोषण के विरूद्ध अधिकार —

अनुच्छेद 23 व 24 में शोषण के विरूद्ध अधिकार का उल्लेख है 

मानव दुर्व्यापार, बेगार या बलात्श्रम को प्रतिषिद्ध करना तथा ऐसा अपराध के दंडनीय होने की घोषणा अनुच्छेद 23 के अंतर्गत किया गया है

अनुच्छेद 23 के तहत मानव के किसी भी परमपरागत शोषण को दण्डनीय अपराध घोषित किया गया है 

मानव शोषण के विरूद्ध प्रत्याभूति सभी व्यक्तियों (नागरिकों या अनागरिको ) को न केवल राज्य के विरूद्ध वरन प्राइवेट व्यक्तियों एवं निकायों के विरूद्ध भी प्राप्त है 

अनुच्छेद 24 के अंतर्गत बालश्रम का निषेध किया गया है 

अनुच्छेद 24 के तहत किसी भी 14 वर्ष से कम आयु के बच्चे को किसी कारखाने खान या अन्य परिसंकटमय उद्योग में नियोजन नहीं किया जा सकता 

कारखाने में 14 वर्ष से कम आयु के बच्चों की नियुक्ति का प्रतिबन्ध कारखाना अधिनियम 1948 तथा खान अधिनियम 1952 के तहत किया गया है 

धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार —

संविधान के अनुच्छेद 25, 26, 27, और 28 नागरिकों को धार्मिक स्वतंत्रता का अधिकार प्रदान करते है 

अनुच्छेद 25 के अनुसार प्रत्येक व्यक्ति को अन्त करण की स्वतंत्रता अर्थात किसी भी धर्म को अबाध रूप से मानने या न मारने की स्वतंत्रता प्राप्त है 

अनुच्छेद 26 धार्मिक समुदायों को अपने धार्मिक मामलो के प्रबंध की स्वतंत्रता प्रदान करता है 

अनुच्छेद 27 के अनुसार राज्य अपनी ओर से किसी धर्म को प्रोत्साहित नहीं करेगा एवं धार्मिक उददेश्य के लिए किए गए कार्यों पर कर नहीं लगाएगा | इस अनुच्छेद का मुख्य उददेश्य धर्म निरपेक्ष राज्य के आदर्शो को मजबूत करना है 

अनुच्छेद 28 में कहा गया है कि राज्य द्वारा अंशत या पूर्णत: पोषित शिक्षा संस्थाओ में धार्मिक शिक्षा पर प्रतिबन्ध है 

शिक्षा एवं संस्कृतिक संबंधी अधिकार —

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 29 और 30 नागरिकों को संस्कृति एवं शिक्षा से सम्बंधित अधिकार प्रदान करते है 

अनुच्छेद 29 के अनुसार प्रत्येक अल्पसंख्यक वर्ग या समुदाय को अपनी भाषा, लिपी एवं संस्कृति के संरक्षण का अधिकार होगा 

अनुच्छेद 29 के अनुसार राजकीय शिक्षण संस्थाओ में धर्म, भाषा एवं जाति के आधार पर व्यक्ति व्यक्ति में भेद नहीं किया जाएगा 

अनुच्छेद 30(1) के अनुसार सभी अल्पसंख्यक वर्गो को अपनी रूचि के अनुसार अपनी शिक्षण संस्थाए स्थापित करने का अधिकार होगा 

अनुच्छेद 30(2) के अनुसार अनुदान या सरकारी सहायता देते समय राज्य इस प्रकार की शिक्षण संस्थाओ एवं अन्य संस्थाओ में भेद भाव नहीं करेगा 

राज्य के नीति निर्देशक तत्व —

भारतीय संविधान के भाग 4 में अनुच्छेद 36 से 51 (16 अनुच्छेद ) में राज्य के नीति निर्देशक तत्व शीषर्क से न्यायिक रूप से अप्रवर्तनी किन्तु शासन की नीति में मूलभूत तत्व के रूप में स्वीकृत उन उपबंधों का वर्णन किया गया है जो सामाजिक, आर्थिक एवं राजनैतिक न्याय को बढ़ावा देकर लोककल्याणकारी राज्य की स्थापना करेंगे 

मूल संविधान में वर्णित 16 अनुच्छेदों के साथ कुछ नए उपबन्ध भी अन्त स्थापित किए गए है जैसे -42 वे संशोधन 1976 द्वारा अनुच्छेद 39(क), अनुच्छेद 43(क) अनुच्छेद 48(क), 44 वे संशोधन 1978 के द्वारा 38(ख) तथा 86 वे संविधान संशोधन 2002 के द्वारा 45(क) 

ऐसे नीति निर्देशक तत्व जो न्याय निर्णय नहीं है -अनुच्छेद 39, अनुच्छेद 41, अनुच्छेद 42, अनुच्छेद 43, अनुच्छेद 45

नीति निदेशक तत्वों का प्रमुख स्रोत्र आयरलैण्ड का संविधान है किन्तु इसके प्रभाव की व्यापकता को दो दिशाओ का स्पर्श करती है प्रथम संवैधानिक तथा द्वितीय विचारात्मक 

भारतीय संविधान के नीति निर्देशक तत्वों को तेज बहादुर सप्रू समिति द्वारा तैयार किए गए थे 

डा. अम्बेडकर ने नीति निर्देशक तत्वों को भारतीय संविधान की अनोखी एवं महत्वपूर्ण विशेषता कहा है 

संवैधानिक उपचारो का अधिकार–

भारतीय संविधान के अनुच्छेद 32 से 35 के तहत संवैधानिक उपचारो के अधिकार का उल्लेख किया गया है 

अनुच्छेद 32 के तहत यह अधिकार संविधान द्वारा प्रदत्त मौलिक अधिकारों के लिए प्रभावी कार्यवाही प्रतिपादित करता है इसलिए इसे डॉ अम्बेडकर ने संविधान की आत्मा कहा है 

अनुच्छेद न्यायालय को एवं अनुच्छेद 226 उच्च न्यायलयो को यह अधिकार देता है कि वे न्यायालय नागरिकों के मूल अधिकारो के हनन की स्थिति में विभिन्न लेख (Writ) जारी कर मौलिक अधिकार की रक्षा करें 

रिट जारी करने के मामले में उच्च न्यायलय को सर्वोच न्यायालय से ज्यादा अधिकार प्राप्त है 

अनुच्छेद 32 व अनुच्छेद 226 के तहत जारी की जाने वाली रिते है बंदी प्रत्यक्षीकरण, परमादेश, अधिकार, पृच्छा उत्प्रेरण, प्रतिषेध 

बन्दी प्रत्यक्षीकरण — 

बन्दी प्रत्यक्षीकरण एक लैटिन पद है जिसका शाब्दिक अर्थ है निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करो यह रिट आदेश के रूप में उन व्यक्तियों के विरूद्ध जारी किया जाता है जो कि किसी को बन्दी बनाए हुए है 

इस रिट द्वारा उन्हें यह आदेश दिया जाता है कि वे निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करें और यह बताए कि उन्हें किस प्राधिकारी से निरुद्ध किया है यदि निरुद्ध व्यक्ति की गिरफ़्तारी के समुचित कारण नहीं है तो न्यायालय उसे छोड़ने का आदेश दे सकता है 

परमादेश —

परमादेश का शाब्दिक अर्थ है हम आदेश देते है इस प्रकार परमादेश न्यायलय का एक आदेश है जिसके द्वारा किसी व्यक्ति या लोक प्राधिकारी जिसके अंतर्गत सरकार और निगम भी शामिल है 

इसमें जिस निकाय या व्यक्ति से यह अपेक्षा की जाती है कि वह कोई लोककल्प विधिक कर्तव्य करें जिसे उसने करने से इंकार किया है और जो किसी अन्य पर्याप्त विधिक उपचार द्वारा कराया नहीं जा सकता अतएव स्पष्ट है कि परमादेश तभी निकला जायेगा जब आवेदक को लीक प्रकृति के किसी विधिक कर्तव्य के अनुपालन का विधिक अधिकार है और जिस पक्षकार के विरूद्ध दिया जा सकता है जो किसी लोक कर्तव्य के लिए आबद्धकर है 

भारत में परमादेश उन अधिकारियो और अन्य व्यक्तियों के विरूद्ध दिया जा सकता है जो किसी लोक कर्तब्य के लिए आबद्धकर है और सरकार के विरूद्ध भी 

परमादेश राष्ट्रपति या राज्यपाल व प्राइवेट व्यक्ति या प्राइवेट निकाय के विरूद्ध जारी नहीं किया जा सकता 

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