Most Important Indian Constitution(संविधान) Questions in Hindi – Polity – Part-3


अस्पृश्यता का अन्त —

अनुच्छेद 17 के अंतर्गत प्राप्त मूल अधिकार केवल राज्य के विरूद्ध ही नहीं अपितु नागरिकों के विरूद्ध भी है 

सन 1995 में अस्पृश्यता अपराध अधिनियम, 1995 को संसद ने पारित किया 

उक्त अधिनियम के अंतर्गत अस्पृश्यता के अपराध के लिए 500 रूपये तक का जुर्माना या 6 माह के कारावास के दण्ड का प्रावधान किया गया है 

सन 1976 में अस्पृश्यता अपराध अधिनियम में संशोधन करते हुए इसका नाम बदलकर Protection of Civil right Act 1955 कर दिया गया है सन 1989 में इसका नाम पुन बदलकर अनुसूचित जाति व जनजाति निरोधक कानून 89 कर दिया गया यह कानून अस्पृश्यता के लिए बनाए गए कानून में सर्वाधिक कठोर है 

अनुच्छेद 17 केवल शाब्दिक अस्पृश्यता का निषेध नहीं करता अपितु जाति प्रथा और परम्परा से चलीं आ रही अस्पृश्यता का निषेध भी करता है 

उपाधियों का अन्त —

संविधान का अनुच्छेद 18 किसी भी नागरिक (भारतीय या विदेशी ) को उपाधि प्रदान करने से मना करता है 

अनुच्छेद 18 के उपबंधों के तहत भारत का कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता 

राज्य के अधीन किसी महत्वपूर्ण पद पर स्थापित कोई व्यक्ति (विदेशी या अन्य ) राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति के बिना किसी विदेशी राज्य से कोई उपाधि स्वीकार नहीं कर सकता 

संविधान द्वारा किसी दण्ड का प्रावधान अनुच्छेद 18 की अवहेलना करने वाला के विरूद्ध नहीं किया गया है 

अनुच्छेद 18 निदेशात्मक प्रकृति का है आदेशात्मक प्रकृति का नहीं 

स्वतंत्रता का अधिकार —

स्वतंत्रता के अधिकारों का प्रावधान अनुच्छेद 19 से 22 तक किया गया है 

विचार एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता –

अनुच्छेद 19 के खण्ड (1) के अनुसार सभी नागरिकों को 

(क) विचार और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता 

(ख) अस्त्र शस्त्र रहित तथा शांतिपूर्वक सम्मेलन की स्वतंत्रता 

(ग) संगम और संघ निर्माण की स्वतंत्रता 

(घ) भारत राज्य क्षेत्र में अबाध भ्रमण की स्वतंत्रता 

(ड) भारत राज्य् क्षेत्र में अबाध निवास और बस जाने की स्वतंत्रता 

(छ) वृति उपजीविका या कारोबार की स्वतंत्रता 

अभिव्यक्ति शब्द अनुच्छेद 19 की विस्तृत व्याख्या करता है तथा अभिव्यक्ति पदावली के अंतर्गत वे सभी माध्यम जो विचार को व्यक्त करने के लिए आवश्यक है आते 

अनुच्छेद 19(1) (क) के अंतर्गत निम्नलिखित मूलाधिकारों को अंतनिर्हित मान्यता प्रदान की गई है 

1- प्रेस की स्वतंत्रता 

2- जानने का अधिकार 

3- सुचना पाने का अधिकार 

4- शिक्षा का अधिकार 

5- शांतिपूर्ण धरना या प्रदर्शन का अधिकार 

6- मौन रहने का अधिकार आदि 

अनुच्छेद 19(1) के अंतर्गत केवल उन्ही धरनो एवं प्रदर्शनो को संरक्षण प्रदान किया गया है जो हिंसात्मक और उच्छखल प्रकृति के नहीं है 

(कामेश्वर सिंह बनाम बिहार राज्य 1962)

किसी भी प्रदर्शन को जो कि हड़ताल का रूप ले ले हड़ताल या प्रदर्शन करने से रोका जा सकता है क्योंकि 19(1) के अंतर्गत हड़ताल करने का अधिकार कोई मूलाधिकार नहीं है  

स्वतंत्रता के अधिकार विशेषतया अनुच्छेद 19 की 6 स्वतंत्रताओं के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायलय ने सन 1997 में दो महत्वपूर्ण निर्णय दिए है प्रथम निर्णय में कहा गया है कि टेलीफ़ोन टेपिंग व्यक्ति की गोपनीयता का गंभीर उल्ल्घंन है दूसरे निर्णय के तहत सर्वोच्च न्यायलय ने 13 नवम्बर 1997 को दिया किसी भी राजनीतिक दल या अन्य संगठन द्वारा करवाए गए बन्द को गैर कानूनी घोषित किया है 

सभी नागरिकों को अनुच्छेद 19(1) ड के तहत भारत के किसी भी भाग में बसने की स्वतंत्रता प्राप्त है तथा इसके लिए किसी अन्य अधिकार या पूर्वानुमति की आवश्यकता नहीं है 

 भ्रमण एवं निवास की स्वतंत्रता पर आपातकाल में प्रतिबन्ध लगाया जा सकता है 

सन 1964 में किए गए प्रावधान के अंतर्गत विदेशी व्यक्तियों के निवास एवं भ्रमण पर प्रतिबन्ध के अतिरिक्त उन्हें भारत से निकला भी जा सकता है 

अपराधों के लिए दोषसिद्ध के सम्बन्ध मे संरक्षण —-

अनुच्छेद 20 के अपराधों के लिए दोषसिद्ध के सम्बन्ध में संरक्षण प्रदान किया है 

कोई कृत्य तब अपराध नहीं था जब वह कृत्य किया गया था परन्तु बाद में अपराध की श्रेणी में आ गया तो यह कार्योत्तर विधि के अंतर्गत आता है 

भूतलक्षीय तथा भविष्यलक्षीय दो प्रकार की विधियां विधानमंडल द्वारा बनाई जा सकती है अनुच्छेद 20 केवल दण्ड विधि बनाने का निषेध करता है सिविल विधियों को भूतलक्षी प्रभाव देने का निषेध नहीं करता 

अनुच्छेद 20 का खण्ड (1) उपबंधित करता है कि किसी व्यक्ति को केवल किसी प्रवृति के उल्लंघन के अतिरिक्त अन्य किसी अपराध के लिए दण्डित नहीं किया जा सकता 

अनुच्छेद 20 खण्ड (2) उपबंधित करता है कि किसी भी व्यक्ति को एक ही अपराध के लिए एक बार से ज्यादा दण्डित नहीं किया जा सकता इसका आधार अंग्रेजी विधि में प्रतिपादित नेमोडेबेट विषवेगसारी है 

किसी व्यक्ति को उस समय तक अपराधी नहीं ठहराया जा सकता जब तक कि उसने अपराध के समय में लागू किसी कानून का उल्लंघन न किया हो 

अनुच्छेद 20(3) का संरक्षण केवल अपराधी को ही प्राप्त है यह सिविल कार्यवाही के सम्बन्ध में लागू नहीं होता 

प्राण एवं दैहिक स्वतंत्रता का संरक्षण —

अनुच्छेद 21 के अनुसार किसी व्यक्ति को उसके प्राण और दैहिक स्वतंत्रता को विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के द्वारा ही वंचित किया जाएगा अन्यथा नहीं 

यह अधिकार सभी को प्राप्त है चाहे वह नागरिक हो या अनागरिक 

नैसर्गिक न्याय के सिद्धांत को अनुच्छेद 21 का आवश्यक तत्व माना गया है 

नैसगिर्क न्याय का सिंद्धांत अनुच्छेद 14 में समाहित है 

इस अनुच्छेद की परिधि में दैहिक स्वाधीनता के अंतर्गत अनुच्छेद 19 द्वारा प्रदत्त सव्तंत्रता के सभी अधिकार आ जाते है 

सर्वोच न्यायलय ने एम एस हास्कर बनाम महाराष्ट्र राज्य के वाद में निर्णय दिया कि दोषसिद्ध व्यक्तियों को न्यायालय में अपील करने का मूल अधिकार प्राप्त है और उसे निःशुल्क निर्णय की प्रतिलिपि एवं कानून सहायता प्राप्त करने का भी अधिकार है 

इसी विषय में न्यायधी कृष्णा अय्यर ने कहा कि निःशुल्क कानूनी सहायता प्रदान करना राज्य का कर्तव्य है न कि दान 

शिक्षा का अधिकार अनुच्छेद 21(क) के अनुसार राज्य छः से चौदह वर्ष आयु तक के सभी बालको को निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा प्रदान करेगा, जैसा कि विधि द्वारा उपबंधित हो यह अनुच्छेद 86 वा संविधान संशोधन अधिनियम 2001 जिंदा गया है 

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