Most Important Indian Constitution(संविधान) Questions in Hindi – Polity – Part-2


  • मूल /मौलिक अधिकार –
  • मूल अधिकार वे अधिकार होते है जो व्यक्ति के जीवन के मौलिक तथा अपरिहार्य होने के कारण संविधान के द्वारा नागरिकों को प्रदान किए जाते है और व्यक्ति के इन अधिकारों में राज्य के द्वारा भी हस्तक्षेप नहीं किया जा सकता है 
  • मूल अधिकारों का सूत्रपात सन 1215 के इंगलैण्ड के मैग्नाकार्टा से हुआ किन्तु मूल अधिकारों को संविधान का अंग बनाने का प्रारम्भ अमेरिका के संविधान से हुआ जो विश्व का प्रथम लिखित संविधान है 
  • भारतीय संविधान के भाग 3 को भारत का अधिकार पत्र कहा जाता है 
  • संविधान भारतीय के भाग 3 में मौलिक अधिकारों की चर्चा की गयी है 
  • संविधान के कुल 23 अनुच्छेदों (अनुच्छेदों 12 से 30 और 32 से 35 ) मूल अधिकारों से सम्बंधित है 
  • भारतीय संविधान द्वारा प्रदान किए गए मौलिक अधिकार असीमित नहीं है वरन संविधान के द्वारा ही उन पर प्रतिबन्ध है 
  • विधि के शासन की स्थापना करना – संविधान के मूल अधिकारों को समाविष्ट करने का उददेश्य है 
  • व्यक्तिगत एवं सामाजिक हितो में सामंजस्य का प्रयास भी मूल अधिकारों के माध्यम से किया जाता है 
  • कोई भी व्यक्ति अपने मूल अधिकारों का अधिग्रहण नहीं कर सकता है क्योंकि 
  • 1- मूल अधिकार किसी व्यक्ति विशेष के लिए नहीं बने है बल्कि ये लोकनीति के अनुरूप होकर सम्पूर्ण समाज के हित के लिए बनाए गए है 
  • 2-मूल अधिकार राज्य पर कतिपय कर्तव्य अधिरोपित करते है जिनसे किसी व्यक्ति विशेष द्वारा राज्य को मुक्त नहीं किया जा सकता है 
  • राज्य शब्द की परिभाषा —
  • भारतीय संविधान का अनुच्छेद 12 संविधान के भाग 3 के प्रयोजन के लिए राज्य, शब्द को परिभाषित किया गया है 
  • मूल अधिकार राज्य के विरूद्ध संरक्षण है 
  • अनुच्छेद 13 के अनुसार राज्य शब्द के अंतर्गत निम्न शामिल है 
  • 1- नगरपालिका   2- ग्रामपंचायत   3- इम्प्रूमेंट ट्रस्ट   4- डिस्ट्रिक्ट बोर्ड   5 – माइनिंग सेटेलमेंट बोर्ड आदि 
  • अनुच्छेद 13 नागरिकों के मौलिक अधिकारों का आधार स्तम्भ है 
  • अनुच्छेद 13 के अनुसार न्यायलय मूल अधिकारों से असंगत विधियों को अवैध घोषित कर सकती है अनुच्छेद 13 के तीन खंडो में विभाजित न्यायिक पुनर्विलोकन की शक्ति समाहित है 
  • न्यायलय को अनुच्छेद 13 के अंतर्गत नागरिकों के मूल अधिकारों का ग्रहरी बनाया गया है 
  • अधिकार –
  • मूल अधिकार संविधान लागू होने के समय 7 थे परन्तु 44 वे संविधान संशोधन अधिनियम 1979 द्वारा सम्पति के अधिकार को मूल अधिकार के रूप में समाप्त कर दिया गया है वर्तमान में सम्पति का अधिकार केवल एक कानूनी अधिकार के रूप में है इसका आशय यह है कि सम्पति के अधिकार का उल्लंघन होने पर अनुच्छेद 32 के अधीन अनुतोष नहीं प्राप्त किया जा सकता 
  • समता का अधिकार —
  • अनुच्छेद 14 से 18 के अंतर्गत प्रत्येक को समता का अधिकार प्रदान किया गया है 
  • विधि के समक्ष समता –
  • समता के सामान्य नियमो को अनुच्छेद 14 में उपबंधित किया गया है तथा यह व्यक्ति के आयुक्ति युक्त विभेद को वर्जित करता है 
  • अनुच्छेद 14 में निहित मूल नियम के विशिष्ट उदाहरण अनुच्छेद 15, 16,  17,  एवं 18 है 
  • विधि के समक्ष समता तथा विधियों का समान संरक्षण वाक्यांशों का प्रयोग अनुच्छेद 14 में किया गया है 
  • विधियों के समान संरक्षण अमेरिका संविधान से तथा विधि के समक्ष समता ब्रिटिश संविधान से लिया गया है 
  • समान न्याय का उददेश्य ही उपरोक्त दो वाक्यांशों में निहित है तथा इन वाक्यांशों से समानता होते हुये भी अनेक अर्थ से भिन्नता है 
  • विधि के शासन का सिंद्धांत –
  • संविधान का आधार भूत ढाँचा है यह अनुच्छेद 14 में निहित है अतः इसे अनुच्छेद 368 के अधीन संविधान संशोधन द्वारा भी ख़त्म नहीं किया जा सकता 
  • धर्म, जाति, मूल वंश, जन्म स्थान, लिंग के आधार पर विभेद का निषेध —
  • अनुच्छेद 15, अनुच्छेद 14 में उल्लेखित समता के सामान्य नियम का एक विशिष्ट उदाहरण है 
  • अनुच्छेद 15 के अंतर्गत जो विधि अवैध है उसे अनुच्छेद 14 के अधीन युक्तियुक्त वर्गीकरण के आधार पर वैध घोषित नहीं किया जा सकता है 
  • केवल जन्म स्थान के आधार पर अनुच्छेद 15 विभेद को वर्जित करता है 
  • निवास स्थल, जन्म स्थान से भिन्न है अत यदि निवास स्थान के आधार पर विभेद किया जाता है तो यह अनुच्छेद 15(1) का अतिक्रमण नहीं होगा किन्तु विभेद का उचित कारण होना चाहिये 
  • राज्य की सेवाओं में सम्मलित होने वाले सभी अभ्यथियो के लिए क्षेत्रीय भाषा में परीक्षण का नियम आवश्यक है अत यह अनुच्छेद 15 का अतिक्रमण नहीं करता 
  • बालको और स्त्रियों की स्वभाविक प्रवृति को ध्यान में रखकर उसके संरक्ष्रण के लिए उपबन्ध बनाने का अधिकार अनुच्छेद 15(3) के तहत राज्य को प्राप्त है 
  • अनुच्छेद 15(4) में (प्रथम संशोधन में जोड़ा गया है ) राज्य किन्ही सामाजिक तथा शैक्षिक दृष्टि से पिछड़े हुए वर्गो या अनुच्छेदों जातियों या जनजातियों की उन्नति के लिए विशेष प्रावधान कर सकता है 
  • लोक नियोजन के विषय में अवसर की समता —
  • संविधान के अनुच्छेद 16 के अनुसार राज्याधीन किसी पद पर नियुक्त या नियोजन से सम्बंधित विषयो में सभी नागरिकों को समान अवसर की प्राप्ति होंगी 
  • जाति, लिंग, धर्म, मूलवंश, जन्मस्थान, निवास, वंशक्रम के आधार पर किसी नागरिक को अयोग्य नहीं समझा जाएगा और न ही विभेद किया जाएगा 
  • अनुच्छेद 16 के प्रावधान गैर सरकारी नौकरियों के बारे में लागू नहीं होते 
  • संविदात्मक मामलो में भी अनुच्छेद 16 लागू नहीं किया जा सकता 
  • संविधान के अनुच्छेद 16(1) में वर्णित समान नियमों के तीन अपवाद भी है जो अनुच्छेद 16(2), 16(3), तथा 16(4) में वर्णित है 
  • अनुच्छेद 16(1) स्वतंत्र एवं पृथक वर्ग कर्मचारियों के बीच समानता न होकर एक ही वर्ग के कर्मचारियों के बीच समानता है 
  • अनुच्छेद 16 के अंतर्गत महत्वपूर्ण है कि चयन का मापदंड मनमाने ढंग से न हो बल्कि निर्धारित अर्हता एवं पद नियुक्ति में तर्कसंगत संबंध होना आवश्यक है 
  • अनुच्छेद 16(2) में दो अन्य आधारों, वंशक्रम तथा निवास स्थान को शामिल किया गया है 
  • अनुच्छेद 16(4) लागू होने की प्रमुख शर्ते है ऐसा वर्ग सामाजिक और शैक्षिक दृष्टि से पिछड़ा हो तथा उसे राज्याधीन पदों में पर्याप्त प्रतिनिधि न मिल पाया हो 

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