Indian Constitution – Indian polity – न्यायपालिका –


न्यायपालिका — 

उच्चतम न्यायालय –

भारतीय संविधान के उपबंधो की व्याख्या के सम्ब्वंध में अंतिम निर्णय देने का प्राधिकार उच्चतम न्यायालय को प्राप्त है इसके द्वारा की गई संविधान की व्याख्या से सभी आबद्ध होते है इसलिए उच्चतम न्यायालय का संविधान को संरक्षक कहा गया है 

अनुच्छेद 124(1)यह उपबंधित करता है की भारत का एक उच्चतम न्यायालय होगा उसमे एक मुख्य न्यायाधीश और 25 से अनधिक (1986 के पश्चात् से ) अन्य न्यायधीशों होंगे साथ ही संसद को यह अधिकार है कि विधि द्वारा वह न्यायधीशो की संख्या में वृद्धि कर सके 

अनुच्छेद 124(3) के अनुसार कोई व्यक्ति उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश के रूप में नियुक्त के लिए तभी योग्य होगा जब की वह भारत का नागरिक हो और 

(क)– किसी उच्च न्यायालय का या दो से अधिक न्यायालयों में 5 वर्ष तक न्यायधीशरहा हो था 

(ख)-किसी उच्च न्यायालय या दो से अधिक उच्च न्यायलयों का दस वर्ष तक अधिवक्ता रहा हो या 

(ग)– राष्ट्रपति की राय में परम्परागत विवेधता हो 

उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीश को पद ग्रहण से पूर्व राष्ट्रपति या उसके द्वारा उस निर्मित नियुक्त व्यक्ति के समक्ष संविधान में विहित रीति से शपथ लेनी होती है 

संविधान के अनुच्छेद 125 के अनुसार उच्चतम न्यायालय के न्यायधीशको ऐसे वेतन तथा भत्ते दिए जायेंगे ,जो समय समय पर संसद न्कानून बनकर विहित करे/

जब भारत के मुख्य न्यायाधीश का पद रिक्त हो या जब वह अनुपस्थिति के कारण अपने पद के कर्तब्यो का पालन करने में असमर्थ हो तो राष्ट्रपति न्यायालय के अन्य न्यायाधीश में से एक को कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश नियुक्त करेगा और वह मुख्य न्यायाधीश के कर्तव्यों का पालन करेंगे (अनुच्छेद 126)

हमारे देश के सर्वोच्च न्यायालय को किसी भी न्यायालय का अधिकरण के खिलाफ अपील ग्रहण करने की असाधारण शक्ति है जबकि अमेरिका उच्च न्यायालय को इस प्रकार की कोई शक्ति नहीं है 

अमेरिकी उच्चतम न्यायालय ने वह की सरकार को सलाह देने की शक्ति ग्रहण करने से इंकार कर दिया है और किसी विषय के पक्षकारो के बीच विवाद को निपटने तक अपने को सीमित कर रखा है जबकि भारत के उच्चतम न्यायालय को अनुच्छेद 143 के अधीन राष्ट्रपति द्वारा उसे निदिर्ष्ट किसी मामले पर अपनी राय देने की शक्ति है 

अनुच्छेद 135  के द्वारा फेडरल न्यायालय के क्षेत्राधिकार को उच्चतम न्यायालय को सौप दिया गया है 

 अनुच्छेद 141 यह कहता है की उच्चतम न्यायालय द्वारा घोषित विधि भारत राज्य के क्षेत्र के भीतर सभी न्यायालयों पर आब्धकर होगी , जबकि उच्चतम न्यायालय अपने पूर्व निर्णयों से बाध्य नहीं है और उचित मामलो में वह अपने निर्णयों को बदल सकतीं है 

संविधान का अनुच्छेद 144 यह घोषित करता है की भारत क्षेत्र में सभी प्राधिकारि सिविल और न्यायिक उच्चतम न्यायालय की सहायता से कम करेंगे 

संविधान के अनुच्च्छेद 130 के अनुसार भारत का सर्वोच्च न्यायालय दिल्ली में है 

मुख्य न्यायाधीश राष्ट्रपति की पूर्व अनुमति लेकर दिल्ली के अतिरिक्त अन्य किसी स्थान पर सर्वोच्च न्यायालय की बैठक आहत कर सकता है 

संविधान द्वारा प्रदत मौलिक अधिकारों को लागू करने के सम्बन्ध में सर्वोच्च न्यायालय के साथ साथ उच्च न्यायालय को भी अधिकार प्रदान किया गया है 

संविधान के अनुच्छेद 132 के अनुसार यदि उच्च न्यायालय यह प्रमाणिक कर दे की विवाद में संविधान की व्याख्या से संबंधित कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न निहित है तो उच्च न्यायालय के निर्णय की अपील सर्वोच्च न्यायालय में की जा सकती है 

यदि उच्च न्यायालय ऐसा प्रमाण पत्र दे तो सर्वोच्च न्यायालय को यह अधिकार प्राप्त है की वह ऐसी अपील की अनुमति प्रदान कर सकता है यदि उसको यह विश्वास हो की उस विषय में संविधान से संबंधित कोई प्रश्न निहित है 

संविधान न्यायालय के अनुच्चीद 146  के अनुसार सेर्वोर्च न्यायालय को अपने कर्मचारियों की नियुक्ति तथा उसकी सेवा शर्तें निर्धारित करने का अधिकार प्राप्त है लेकिन राष्ट पति आवश्यक समझे तो यह निर्देश दे सकता है इस प्रकार की नियुक्ति या संघ लोक सेवा आयोग के परामर्श के बाद की जाए 

संवैधानिक पीठ का आशय सर्वोच्च न्यायालय की ऐसी पीठ से है जिनके द्वारा संवैधानिक विवादों की सुनवाई की जाए 

सर्वोच्च न्यायालय में प्रक्रिया संबंधी नियम बनकर यह व्यवस्था की है संवैधानिक पीठ में कम से कम 5 न्यायाधीश होंगे 

दोष सिद्ध कदाचार अथवा असमर्थता के कारण संसद के द्वारा न्यायाधीश को उसके पड़ से हटाया जा सकता है 

यदि संसद के दोनों सदन अलग अलग अपने कुल सदस्यों की संख्या के बहुमत तथा दोनों सदनों की बैठक में उपस्थित ⅔ बहुमत से न्यायाधीश के योग्य या आपत्तिजनक आचरण करने वाला सिद्ध हो जाता है तो भारत के राष्ट्रपति के आदेश  से उस न्यायाधीश को अपने पड़ से हटाना होगा 

न्यायाधीश को हटाने वाला प्रस्ताव संसद के एक ही सत्र में स्वीकृत होना चाहिए 

महाभियोग की प्रक्रिया में न्यायाधीश को अपना पक्ष प्रस्तुत करने का पूरा अवसर दिया जाता है 

भारत के संवैधानिक इतिहास में अब तक किसी न्यायाधीश के विरुद्ध महाभियोग का प्रस्ताव पारित नहीं किया गया 

सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट कर दिया है की यदि भारत के मुख्य न्यायाधीश परामर्श की प्रक्रिया पुरी किए बिना न्याधीश की नियुक्ति और उच्च न्यायालयों के स्थान्तरण के सम्बन्ध में राष्ट्रपति को सिफारिश करते है तो राट्रपति 

ऐसी सिफारिश मानने को बाध्य नहीं है 

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