Indian Constitution – न्यायाधीश की नियुक्ति – Indian Polity – राज्यपाल


न्यायाधीश की नियुक्ति –

प्रत्येक उच्च न्यायालय में एक प्रमुख nyayadheeव कुछ अन्य न्यायाधीश होते है जिनकी संख्या नियमित करने का अधिकार राष्ट्रपति को है 

मुख्य न्यायाधीश की न्युक्ति भारत के राष्ट्रपति भारत के मुख्य न्यायाधीश और उस राज्य के राज्य पाल के परामर्श से होती है 

न्यायाधीशो की योग्यता —

वह भारत का नागरिक हो 

वह कम से कम 10 वर्ष तक भारत किसी क्षेत्र में न्याय संबंधी पद पर कार्य कर चूका हो अथवा एक या एक से अधिक उच्च न्यायालयों का लगातार 10 वर्ष तक अधिवक्ता रह चूका हो अथवा राष्ट्रपति की दृष्टि में कानून का अच्छा ज्ञाता हो 

वेतन और भत्ते —

वर्तमान में उच्च न्यायालयों के मुख्य न्यायाधीश को…….. रूपये प्रति माह वेतन प्राप्त होता है 

न्यायाधीशो के लिए सेनानिवृती के पश्चात् की व्यस्थाए भी की गई 

न्यायाधीशो के वेतन तथा मद की शर्तो में उनके हितो के विरूद्ध कोई परिवर्तन नहीं किया जा सकता 

उसका वेतन तथा भत्ते राज्य की संचित निधि पर भारित होता है 

कार्यकाल —

उच्च न्यायालय के न्यायाधीशो का कार्य काल 62 वर्ष की आयु तक निश्चित किया गया है 

परन्तु इससे पूर्व वह स्वयं पद त्याग कर सकता है 

न्यायाधीशो पर प्रतिबन्ध —

संविधान के अनुच्छेद 220 के अनुसार उच्च न्यायालय कोई स्थानीय न्यायाधीश पदनिवृति के बाद उसी उच्च न्यायालय या उस उच्च न्यायलय के किसी अधीनस्थ न्यायालय में वकालत नहीं कर सकता 

अधीनस्थ न्यायालय –

जिला स्तर पर सबसे बड़ा फ़ौजदारी न्यायालय सत्र न्यायालय या सेशन जज का न्यायालय होता है 

फ़ौजदारी विवादों का निर्णय करते समय उसे सेशन जज और दीवानी विवादों का निर्णय करते समय उसे जिला जज कहते है 

सेशन जज के निचे प्रथम श्रेणी के दण्डाधिकारी होते है जिन्हे द्वितीय तथा तृतीय श्रेणी के दण्डाधिकारी के विरूद्ध अपील सुनने का अधिकार होता है 

प्रत्येक तहसीलदार फ़ौजदारी मामलो में द्वितीय श्रेणी का दण्डाधिकारी होता है 

सभी नायब तहसीलदार फ़ौजदारी के क्षेत्र में तृतीय श्रेणी के दण्डाधिकारी होते है 

प्रत्येक जिले में जिला न्यायाधीश दीवानी मामलों का सबसे बड़ा न्यायाधीश होता thav

जिला न्यायाधीश के निचे दीवानी न्यायाधीश होते है जिन्हे जिला न्यायाधीश के समान ही अधिकार प्राप्त होते है किन्तु इसे अपील सुनने का अधिकार नहीं होता 

प्रत्येक राज्य में एक राजस्व मण्डल होता है जो राजस्व विवादों का निर्णय करने के लिए सबसे बड़ी अदालत है 

राजस्व एवं मालगुजारी संबंधी कार्य के लिए राज्य की कई कमीश्नरियो में विभक्त कर दिया जाता है और प्रत्येक कमिशनरी का प्रधान कमिश्नर या आयुक्त कहलाता है 

आयुक्त द्वारा जिलाधीश के फैसले की अपील सुनी जाती है और आयुक्त की अपीलों की सुनवाई राजस्व में होती है 

राज्य की कार्यपालिका —

राज्यपाल –

राज्य की कार्यपालिका के सम्बन्ध में उपबंध संविधान के अनुच्छेद 153 से 167 तक में दिए गए है 

राज्य की कार्यपालिका शक्ति राज्यपाल में निहित होती है और वह अपनी कार्यपालिका शक्तियों का उपयोग या तो स्वयं या अपने अधीनस्थ अधिकारियो के माध्यम से करता है 

राज्यपाल की नियुक्ति —

राज्यपाल की नियुक्ति राष्ट्रपति के द्वारा की जाती है 

राज्यपाल पद के सम्बन्ध में निर्वाचित के स्थान पर मनोनयन की पद्धति को अपनाया गया है 

कार्यकाल  तथा वेतन —

राज्यपाल का कार्यकाल 5 वर्ष होता है लेकिन वह अपने उत्तराधिकारी के पद ग्रहण करने तक अपने पद पर बना रह सकता है संविधान के अनुसार एक ही व्यक्ति दो या दो से अधिक राज्यों का 

राज्यपालभी नियुक्त किया जा सकता है 

राज्यपाल को 75000 प्रतिमाह वेतन मिलता है 

राज्यपाल का वेतन और भत्ते राज्य की संचित विधि पर भारित है 

योग्यताए —

वह भारत का नागरिक हो 

उसकी आयु कम से कम 35 वर्ष हो 

राज्यपाल संसद या राज्य के विधानमण्डल का सदस्य नहीं हो सकता और यदि वह किसी सदन का सदस्य है तो राज्यपाल के पद पर नियुक्त की तिथि से उसे अपनी सदन की सदस्यता का त्याग करना होगा 

संविधान के अनुच्छेद 153 के अनुसार समानतः प्रत्येक राज्य के लिए एक राज्यपाल होगा परन्तु एक ही व्यक्ति दो या दो से अधिक राज्यों का राज्यपाल भी नियुक्त किया जा सकता है यह व्यवस्था सातवे संविधान संशोधन 1956 के द्वारा की गईं  थी 

राज्यपाल की शक्तिया —

संविधान द्वारा राज्यपाल को पर्याप्त और व्यापक शक्तिया प्रदान की गई है 

राज्य की कार्यपालिका शक्तिया राज्यपाल में निहित है जिसका प्रयोग इस संविधान के अनुसार स्वयं या अपने अधीनस्थ पदाधिकारीयों द्वारा करता है 

वह मुख्यमंत्री की नियुक्ति करता है तथा उसके परामर्श पर अन्य मंत्रियो की नियुक्ति करता है 

राज्यपाल की कार्यपालिका शक्तिया राज्य सूची के 66 विषयो तक विस्तृत है 

राज्य सरकार के कार्य के सम्बंध में वह नियमों का निर्माण करता है 

राज्यपाल विधानमण्डल को सन्देश भेज सकता है 

वह मंत्रियो के मध्य  कार्यों का विभाजन ( मुख्यमंत्री की सलाह पर ) करता है 

राज्यपाल विधेयक को अस्वीकृत कर सकता है या उसे पुनविचार के लिए विधान मण्डल को लौटा सकता है 

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