Dalton ‘s Atomic Theory |Chemistry |डाल्टन का परमाणु सिद्धांत


डाल्टन का परमाणु सिद्धांत (Dalton ‘s Atomic Theory)

सन 1803 मे जॉन डाल्टन ने परमाणु सिद्धांत दिया | जिसके अनुसार प्रत्येक तत्व (पदार्थ या द्रव्य) अति सूक्ष्म अविभाज्य कर्णो से मिलकर बना होता है 

जिन्हे परमाणु कहते है 

परमाणु को  न बनाया जा सकता है और न ही नष्ट किया जा सकता है 

एक तत्व के सभी परमाणु भार आकर तथा अन्य गुणों मे सामान होते है इनमे प्रत्येक तत्व के परमाणु की निश्चित स्थायी संख्या उपस्थित रहतीं है 

परमाणु (Atom)-

तत्व का वह सूक्ष्म कण जिसमे पदार्थ के सभी गुण होते है तथा रासायनिक क्रिया मे भाग लेता है परमाणु कहलाता है 

परमाणु के तीन मूल कर्ण है इलेक्ट्रान प्रोट्रान तथा न्युट्रान 

इलेक्ट्रान

प्रकृति ऋणावेशित सन 1909 मे मिलिकन द्वारा तेल बूंद विधि द्वारा निर्धारित 

खोजकर्ता -जे• जे• थॉमसन 

आवेश 1.602*10^-19कुलाम 

द्रव्यमान 9.109535*10^-28 ग्राम 

e/m अनुपात 1.76*10^8 कुलाम /ग्राम 

प्रोटान – 

प्रकृति – धनावेशित 

खोजकर्ता – इ• रदर फोर्ड 

आवेश – 1.602*10^-19 कुलाम 

द्रव्यमान -1.672*10^-24 ग्राम 

न्युट्रान

प्रकृति -आवेशहीन 

खोजकर्ता -जेम्स चैडविक 

द्रव्यमान – 1.675*10^-24 ग्राम 

अणु (Molecule)-

पदार्थ का वह अति सूक्ष्म कण जो स्वत्रन्त्र अवस्था मे रह सकता है अणु कहलाता है 

यौगिक के अणुओ मे दो या दो अधिक प्रकार के परमाणु होते है 

नाभिक (Nucleus)-

खोजकर्ता -रदर फोर्ड 

परमाणु के मध्य मे एक अति सूक्ष्म पिण्ड होता है जिसे नाभिक कहते है नाभिक मे परमाणु का समस्त धनावेश तथा द्रव्यमान स्थिर रहता है 

परमाणु क्रमांक -(Atomic Number)

किसी तत्व के परमाणु मे उपस्थित प्रोटानो की संख्या, परमाणु क्रमांक के बराबर होती है अर्थात 

परमाणु क्रमांक =प्रोटानो की संख्या =इलेक्ट्रॉनो की संख्या 

द्रव्यमान संख्या (Mass Number)-

किसी तत्व के परमाणु के नाभिक मे उपस्थित प्रोट्रानो तथा न्युट्रानो की संख्या के योग को द्रव्यमान संख्या कहते है अर्थात 

द्रव्यमान संख्या (परमाणु भार )

=प्रोटानो की संख्या + न्युट्रानो की संख्या 

=परमाणु संख्या + न्युट्रानो की संख्या 

=इलेक्ट्रानो की संख्या + न्युट्रानो की संख्या 

संयोजी इलेक्ट्रान (Valency Electron)- 

किसी तत्व के परमाणुओं द्वारा रासायनिक संयोग मे स्थानांतरण या साझे मे प्रयुक्त एलेक्ट्रोनो को उस तत्व के संयोजी इलेक्ट्रान जिस कोश मे होते है उसे संयोजी कोश कहते है 

समान संयोजी इलेक्ट्रान वाले तत्वों के रासायनिक गुण भी समान होते है 

ऐसे तत्व जिनके परमाणुओं मे संयोजी एलेक्ट्रोनो की संख्या 1, 2, तथा 3 होत्ती है 

धातु कहलाते है तथा ऐसे तत्व जिनके परमाणुओं मे संयोजी इलेक्ट्रानो की संख्या 4, 5, 6,और 7 होती है अधातु कहलाते है 

समस्थानिक (Isotopes)-

एक ही तत्व के परमाणुओं को जिनकी परमाणुओं संख्या सामान हो परन्तु परमाणु द्रव्यमान संख्या भिन्न हो समस्थानिक कहते है -उदाहरण 

प्रोटियम 

ड्यूटेरियन 

ट्राइटियम 

हाइड्रोजन के समस्थानिक है 

समभारिक (Isobars)-

विभिन्न तत्वों के ऐसे परमाणु जिनकी द्रव्यमान संख्या सामान होती है लेकिन परमाणु क्रमांक भिन्न भिन्न होते है समभारी कहलाते है 

रेडियसक्रियता (Radioactivity)-

वे तत्व जो प्रकृति मे स्वतः विघटित होते रहते है रेडियोएक्टिव तत्व कहलाते है इनसे निकलने वाली किरणे रेडियोएक्टिव किरणे कहलाती है तथा इनका यह गुण  रेडियोसक्रियता कहलाता है 

रेडियोएक्टिव पदार्थो से निकलने वाली किरणे तीन प्रकार की होती है 

अल्फा किरणे (alpha Rays )-

अल्फा किरणे हीलियम नाभिक या [He ^2 Or He++] के बने होते है तथा प्रत्येक मे दो प्रोट्रान दो न्युट्रान तथा दो इकाई धन आवेश होता है 

ये प्रबल चुम्बकीय या विद्युत क्षेत्र मे ऋण प्लेट की ओर विक्षेपित हो जाते है 

बीटा किरणे (B -rays)-

ये किरणे ऋणावेशित कर्णो के बने होते है अत ये वास्तव मे इलेक्ट्रानो के प्रवाह होते है 

ये विधुतीय तथा चुम्बकीय क्षेत्र मे धन प्लेट की ओर अधिक विक्षेपित होते है 

गामा किरणे (gama re)-

आवेश शून्य होता है तथा ये द्रव्यमान रहित होती है 

ये किरणे विद्युतींय तथा चुंबकीय क्षेत्र मे विचलित नहीं होती है अत ये उदासीन होती है 

ये ऐसी विद्युतीयचुंबकीय तरंगे है जिनकी तरंग दैर्ध्य 10^-10 सेमी से 10^-12 सेमी होती है 

गामा किरणे को रेडियोसक्रिय विघटन का द्वितीयक प्रभाव मान सकते है 

गामा किरणों को रेडियोसक्रिय विघटन का द्वितीय प्रभाव मान सकते है 

ऐसे नाभिक जिनमे प्रोटानो तथा न्युट्रानो की संख्या सामान होती है स्थाई नाभिक कहलाते है 

सभी ज्ञात तत्वों के समस्थानिक जिनका परमाणु क्रमांक 83 से ज्यादा होता है रेडियोएक्टिव तत्व कहलाते है 

अर्द्ध आयु काल (Half -Life period)-

एक रेडियोएक्टिव पदार्थ के किसी नमूने की आधी मात्रा विघटित होने मे जो समय लगता है उसे उस पदार्थ की अर्द्ध आयु कहते है 

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